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गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य में गिद्धों की उत्साहजनक वृद्धि

भानपुरा/मन्दसौर परिक्षेत्र में 1084 गिद्धों के साथ बना सुरक्षित ठिकाना

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य एक बार फिर गिद्धों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। प्रदेशव्यापी गिद्ध गणना 2025-26 के तहत आज संपन्न हुई गणना का निरीक्षण वन संरक्षक (CF) उज्जैन वृत्त, श्री आलोक पाठक एवं वनमंडलाधिकारी (DFO) मंदसौर, श्री संजय रायखेरे द्वारा किया गया। गणना के परिणामों में कुल 1084 गिद्ध पाए गए हैं।

 

*विदेशी मेहमानों का आगमन: प्रवास की जानकारी*

 

गाँधीसागर अभयारण्य केवल स्थानीय गिद्धों का ही नहीं, बल्कि विदेशी प्रजातियों का भी पसंदीदा ठिकाना है।

 

कहाँ से आते हैं: गणना में पाए गए हिमालयन ग्रिफन, यूरेशियन ग्रिफन और सिनेरियस जैसे गिद्ध लंबी दूरी तय कर यहाँ पहुँचते हैं। ये मुख्य रूप से तिब्बत, मध्य एशिया, और हिमालय की ऊँचाइयों से शीतकाल के दौरान प्रवास करते हैं।

 

प्रवास का समय: ये प्रवासी गिद्ध आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर के महीने में गाँधीसागर पहुँचते हैं और गर्मी शुरू होने से पहले यानी मार्च-अप्रैल तक यहाँ रुकते हैं।

 

ये गिद्ध वर्ष भर अभयारण्य में रहते हैं और यहीं प्रजनन करते हैं:

• भारतीय गिद्ध (Long-billed Vulture): चंबल की ऊँची चट्टानों पर घोंसले बनाने वाली मुख्य प्रजाति।

• सफेद पीठ वाला गिद्ध (White-rumped Vulture): पेड़ों पर बसेरा करने वाले ये गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं।

• राज गिद्ध (Red-headed Vulture): अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट लाल सिर वाली प्रजाति।

• मिस्र का गिद्ध (Egyptian Vulture): आकार में छोटे और सफेद रंग के स्थानीय गिद्ध।

 

विदेशी मेहमान/प्रवासी (3 प्रजातियाँ):

ये प्रजातियाँ शीतकाल (अक्टूबर-नवंबर से मार्च-अप्रैल) के दौरान तिब्बत, मध्य एशिया और हिमालय की ऊँचाइयों से प्रवास कर यहाँ पहुँचती हैं:

 

• हिमालयन ग्रिफन (Himalayan Griffon): हिमालय के ठंडे क्षेत्रों से आने वाले विशालकाय गिद्ध।

 

• यूरेशियन ग्रिफन (Eurasian Griffon): लंबी दूरी तय कर आने वाले अंतरराष्ट्रीय प्रवासी।

 

• सिनेरियस गिद्ध (Cinereous Vulture): दुनिया के सबसे भारी और बड़े गिद्धों में शुमार।

 

गाँधीसागर ही क्यों है ‘गिद्धों का स्वर्ग’?

निरीक्षण के दौरान डीएफओ श्री संजय रायखेरे ने गाँधीसागर की अनुकूलता के प्रमुख कारण बताए:

 

सुरक्षित चट्टानें (Nesting Sites): चंबल नदी के किनारे स्थित ऊँची और दुर्गम चट्टानें गिद्धों को सुरक्षित घोंसले बनाने और प्रजनन के लिए आदर्श स्थान प्रदान करती हैं।

 

प्रचुर भोजन और जल: अभयारण्य में वन्यजीवों की अच्छी संख्या और आस-पास के क्षेत्रों में पशुधन की उपलब्धता के कारण इन्हें पर्याप्त भोजन मिलता है। चंबल का पानी इनके लिए बारहमासी जल स्रोत है।

 

मानवीय हस्तक्षेप मुक्त: अभयारण्य का शांत वातावरण और सुरक्षित कॉरिडोर इनके फलने-फूलने में मदद करता है।

 

संरक्षण के प्रयास

 

सीसीएफ श्री आलोक पाठक ने बताया कि गाँधीसागर में 120 सक्रिय घोंसलों का मिलना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ का ईकोसिस्टम बेहद मजबूत है। हम इन प्रकृति के सफाईकर्मियों के संरक्षण के लिए लगातार काम कर रहे हैं।

Top News Wala
Author: Top News Wala

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